1971 में सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर भारत ने खो दिया था अवसर, बोले सद्गुरु

ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर को लेकर अपनी राय रखी है। उन्होंने इस रणनीतिक मुद्दे पर एक ऐतिहासिक चूक और तत्काल कार्रवाई की जरूरत बताई है।

सद्गुरु राष्ट्रीय सुरक्षा बढ़ाने के लिए सिलीगुड़ी कॉरिडोर को मजबूत करने की आवश्यकता पर चर्चा कर रहे हैं।
सद्गुरु सन्निधि, बेंगलुरु में सत्संग के दौरान सद्गुरु सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर अपने विचार समझाते हुए। (Photo: Instagram/Sadguru)

सद्गुरु ने भारत की सामरिक सुरक्षा पर बात की

ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु ने एक बहुत संवेदनशील मुद्दे पर बात रखी है। यह मुद्दा भारत की सामरिक सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ा है। बेंगलुरु स्थित सद्गुरु सन्निधि में सत्संग का आयोजन हुआ। इसी दौरान उन्होंने अपनी बात कही। उनसे बांग्लादेश की अंतरिम सरकार की टिप्पणियों पर सवाल किया गया था। ये टिप्पणियां सिलीगुड़ी कॉरिडोर को लेकर थीं। सद्गुरु ने इसे ’78 साल पुरानी विसंगति’ कहा। उन्होंने इसे भारत के विभाजन की देन बताया।

भारत ने 1971 में बना अवसर खो दिया

सद्गुरु ने बताया कि सिलीगुड़ी कॉरिडोर को ‘चिकन नेक’ भी कहा जाता है। यह एक बहुत संकरी जमीन है। यह जमीन भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ती है। 1947 के विभाजन के समय यह स्थिति बनी थी। उन्होंने कहा कि 1946-47 में भारत के पास इसे सुधारने का अधिकार या परिस्थितियाँ नहीं थीं। लेकिन 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के बाद स्थिति बदल गई। तब भारत के पास पूरा अवसर और अधिकार था। सद्गुरु ने कहा कि भारत ने वह अवसर खो दिया।

‘चिकन नेक’ को अब ‘हाथी’ बनाने का समय

सद्गुरु ने अपनी राय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर भी साझा की। उन्होंने ‘एक्स’ पर लिखा कि सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत विभाजन से पैदा हुई 78 साल पुरानी विसंगति है। इसे 1971 में ही ठीक कर देना चाहिए था। अब देश की संप्रभुता को खुली चुनौती मिल रही है। सद्गुरु ने कहा कि अब समय आ गया है कि इस ‘चिकन’ को पोषण दिया जाए। इसे ‘हाथी’ बनाया जाना चाहिए।

सद्गुरु ने प्रतीकात्मक भाषा का प्रयोग किया। उन्होंने कहा कि किसी भी देश की नींव कमजोरी पर नहीं टिक सकती। उन्होंने कहा, ‘राष्ट्र केवल ‘चिकन’ बनकर नहीं चल सकता। उसे निश्चित रूप से ‘हाथी’ बनना होगा। इसके लिए पोषण, ताकत, या कोई भी ठोस कदम उठाना पड़े। तो वह कदम उठाना ही चाहिए। हर कदम की कीमत होती है, लेकिन राष्ट्र की सुरक्षा उससे कहीं बड़ी है।’

मौजूदा वैश्विक हालात में यह सोच व्यावहारिक नहीं

उन्होंने यह भी कहा कि आदर्श स्थिति में दुनिया बिना सीमाओं और देशों की हो सकती है। लेकिन मौजूदा वैश्विक हालात में यह सोच व्यावहारिक नहीं है। यह अच्छा होता अगर दुनिया में कोई सीमा न होती। लेकिन अभी हम उस स्तर पर नहीं पहुँचे हैं। अचानक यह मान लेना कि सब कुछ ठीक हो जाएगा, यह एक अव्यावहारिक सोच है।

‘हाथी की गर्दन’ को संभालना आसान होता है

सद्गुरु ने दोहराया कि यह विसंगति केवल 78 साल पुरानी है। इसमें सुधार अब भी किया जा सकता है। उन्होंने कहा, ‘हाथी की गर्दन को संभालना आसान होता है।’ सद्गुरु ने स्पष्ट किया कि सिलीगुड़ी कॉरिडोर को मजबूत करना समय की मांग है। सद्गुरु पहले भी कई मुद्दों पर चिंता जता चुके हैं। इनमें बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हो रही हिंसा भी शामिल है। मंदिरों के विनाश और जनसांख्यिकीय दबाव पर भी उन्होंने चिंता व्यक्त की है।


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